Tuesday, November 11, 2008
द्रविणों पर आर्यो का हमला
जिस दिन मैं भिलाई से निकला वह दिन था, 1 अक्टूबर और अगले दिन 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु जी द्वारा न्याय एवं शांति रैली निकाली गई. इसे देखने की इच्छा थी. पिछले साल भी गांधी जयंती के दिन मैं रायगढ़ गया था जहाँ मेधा पाटेकर जी आई थीं. शहीद सत्यभामा जी को श्रद्धांजली देकर अन्य लोगों के साथ तमनार ब्लॉक के “गारे” और “राबो” गाँव पहुंचे थे जहाँ कुछ दिन पहले ही जिन्दल कोल माईंस और राबो बान्ध के खिलाफ की जा रही एक जन सुनवाई के दौरान लाठी चार्ज हुई थी और 105 ग्रामीण घायल हुये थे जिसमें 11 लोग गम्भीर रूप से घायल हुये थे. इस साल भी छत्तीसगढ़ के एक ऎसे क्षेत्र में गांधी जयंती देखने/मनाने गया जहाँ घोर अशांति है. इस बार की दंतेवाड़ा की रैली में लगभग 200-300 आदिवासी शामिल हुये थे. सभी नक्सली और सलवा-जुडुम प्रभावित थे और अपनी मूलभूत जरूरतों की मांग कर रहे थे.
सुबह-सुबह, जगदलपुर से दंतेवाड़ा की ड्राईव बड़ी सुहावनी थी. ठंडी की शुरूआत थी, हल्की सूरज की रोशनी पड़ते ही दूर-दूर तक गहरी धुन्ध फैल गई और 10-20 मीटर से आगे कुछ दिखाई नही दे रहा था. बड़ी सुनहरी और सुहावनी सुबह थी. इस रस्ते पर जिस चीज ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया वह था नवरात्रि के पद यात्री. इसके बारे में आगे और भी बहुत सी बातें लिखना है लेकिन बस्तर में ऎसा पहली बार हुआ कि लोग डोंगरगढ़ की तरह पैदल दंतेश्वरी माता के दर्शन के लिये जा रहे है. एस्सार ने रास्ते भर ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था की थी.
जहाँ सैकड़ो सालों से रोज या हर हफ्ते यहाँ के आदिवासी कई किलोमीटर भूखे-प्यासे पैदल चल कर बाज़ार या अन्य काम के लिये कस्बे या शहर आते है वहीं शहरी सभ्य समाज के नौजवान लड़के-लड़कियाँ पाँव में पट्टी बांध-बांध कर पद यात्रा कर रहे थे और उनकी यह दशा देखकर साथ चल रहे आदिवासियों को थोड़ा सुख तो जरूर मिला होगा.
खैर, मैं दंतेवाड़ा पहुंचा और सीधे वहाँ गया जहाँ से रैली शुरू होनी थी. धीरे-धीरे लोग इकट्ठे होने शुरू हुये. लोगों को इस तरह इकट्ठे होते देख मुझे लगभग तीन साल पहले सलवा जुडुम पर बनाये जाने वाले एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म की याद आ गई, तब सलवा जुडुम को शुरू हुये ज्यादा दिन नहीं हुये थे और हम भैरमगढ़ और पास की कुछ नक्सली प्रभावित गाँवों में रैली के साथ-साथ गये थे.
लेकिन उस शांति रैली और आज के शांति रैली में नि:सन्देह अंतर है. रैली में दोनों तरफ से प्रभावित लोग शामिल थे और अब वे सामान्य जीवन जीने के लिये संघर्ष कर रहे है. शाम होते-होते सभी अपने-अपने घरों को लौट गये. दिन भर की रैली और फिर इस पर शहरी नजरान्दाजगी देखकर मन भारी हुआ कि सैकड़ों की संख्या में लोग दंतेश्वरी माता के दर्शन के लिये लोग दूर-दूर से आ रहे है लेकिन शहर में हो रही इस रैली/गतिविधि के बारे में शहर में कोई चर्चा तक नही है. सारे युवा और सभ्य समाज चुप्प है. क्यों युवा वर्ग अपने आस-पास घट रही इन घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया नही दे रही? आज बस्तर ही नही पूरे प्रदेश में युवा ताकत इसी तरह से निष्क्रिय है और प्रतिरोध नही कर रही है.
इस रैली में एक छोटा सा 5-6 साल का बच्चा भी था जो पूरे समय अपने साथ एक ए.के.47 रायफल (खिलौने का) रखे रहा. उसके पिताजी ने बतलाया कि “मिज़ो फोर्स के लोग इसके हीरो है और यह बहुत दिनों से उन्ही की तरह बन्दूक रखने की ज़िद कर रहा था.”
कुछ महीने पहले मेरी मुलाकात पखान्जूर के मांड क्षेत्र से आये एक परिवार से हुई थी. उनमें से 30-32 साल के एक लड़के ने बतलाया था कि जब वह 5-6 साल का था तब पहली बार नक्सली उसके गाँव आये थे और आज उनका गाँव नक्सली और पुलिस के बीच पिस रहा है.
किस तरह से लोग और बच्चे बन्दूक के साये में पल-बढ़ रहे है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है. क्या नक्सली, सलवा जुडुम या फोर्स (सरकार) एक पीढ़ी के बाद फिर दूसरी पीढ़ी को यही विकल्प या आदर्श के रूप में पेश कर रहे है?
खैर, दूसरे दिन “नेन्द्रा” जाना हुआ. “नेन्द्रा”, दंतेवाड़ा जिले का एक ऎसा गाँव है जिसे चार बार जलाया है और कई लोगों को मारा गया है. वनवासी चेतना आश्रम के प्रयास से अब कुछ लोग वहाँ रहने आये है, जो भागकर आन्ध्रप्रदेश चले गये थे. वे आश्रम के सहयोग से अस्थाई घर बना कर रह रहे है और आश्रम द्वारा राशन की मदद दी जा रही है. लोग अब अपने घर/गाँव वापस आना चाहते है. खेती करना चाहते है और फिर पहले की तरह जीना चाहते है. यह तो सिर्फ एक गाँव की बात है दंतेवाड़ा में तो ऎसे बहुत से गाँव से है.
घने जंगल में 8 कि. मी. पैदल चलकर हम इस गाँव तक पहुंचे. कितने टूटे, परेशान और निराश दिखे यहाँ के लोग. समझ पाना बहुत मुश्किल है कि कोई कैसे इनके घरों को आग लगा सकता है, कैसे मार सकता है. यहाँ रह रहे लोगों ने जो आप-बीती सुनाई वह किसी भयंकर बुरे सपने से कम नहीं थी. किसी भी स्थिति को समझने और जानने के लिये मुझे लगता है कि वहाँ जाना और लोगों से बात करना बहुत जरूरी है. लोग कैम्पों में कैद है. जगह-जगह चेकिंग पोस्ट है, मिलेट्री है, फोर्स है. यहाँ हर कोई संदिग्ध है और एक-दूसरे के दुश्मन है.
“विश्व इतिहास की झलक” के पृष्ठ 505 में उल्लेख है- फ्रांस की राज्य क्रांति पर लिखने वाले थामस कार्लाइल नामक एक अंग्रेज लेखक ने जनता के हाल जो बयान किया है, वह एक निराली शैली है- “श्रमजीवियों की हालत फिर खराब हो रही है. दुर्भाग्य की बात है! क्योंकि इनकी संख्या दो-ढ़ाई करोड़ है. जिनको हम एक तरह की धुँधली घनी एकता के हैवानी लेकिन धुँधले, बहुत दूर के गँवारू भीड़ जैसे लौंदे में इकट्ठा करके कम्यून, या ज्यादा मनुष्यता से, ‘जनता’ कहते है. सचमुच जनता, लेकिन फिर भी यह अज़ीब बात है कि अगर कल्पना पर जोर डाल कर आप इनके साथ-साथ सारे फ्रांस में इनकी मिट्टी की मड़ैयों में, इनकी कोठरियों और झोपड़ियों में, चलें, तो मालूम होगा कि जनता सिर्फ इकाईयों की बनी हुई है. इसकी हरेक इकाई का अपना अलग-अलग दिल है और रंग है, वह अपनी ही खाल में खड़ा है और अगर तुम उसे नोचोगे तो ख़ून बहने लगेगा.” सोलहवें लुई के राज में फ्रांस की यही हालत थी. यह बयान 1789 ई. के फ्रांस पर ही नही बल्कि 2007 के बस्तर पर कितनी अच्छी तरह फबता है.
और फिर आगे पृष्ठ 662 पर एक कविता है-
“ज़ुल्मियों से मिल गये और हो गये बस शांत कर इकट्ठे दूसरों के ताज और सिद्धांत
और चिथड़े और कुछ टुकड़े मुलम्मेदार पहनकर फिरने लगे सब लाज शर्म बिसार.”
आज इस चुनाव के समय में राजनीतिज्ञों पर इससे अच्छी कविता और क्या हो सकती है?
नगरनार और लोहंड़ीगुड़ा भी गया जहाँ उद्योग लगने है, लोगों को कोई स्पष्ट जानकारी नही है और लोग भविष्य को लेकर भयभीत भी है. अलग-अलग राजनैतिक दल के लोग वहाँ जाते रहते है और सांत्वना देते रहते है. जब मैं नगरनार पहुंचा तब लोग धरना देने की तैयारी में थे. ये वे लोग है जिनका जमीन ले लिया गया है और वायदानुसार आज तक इन्हें नौकरी नहीं मिली है और न ही खेती करने दिया जा रहा है. लोहंड़ीगुड़ा के लोग तो और भी ज्यादा डरे हुये है. ग्रामीण कुछ भी बोलने और बतलाने से भी कतरा रहे है.
आज बस्तर को विकास और सभ्य बनाये जाने के नाम पर जबरदस्ती की जा रही औद्योगिकीकरण और गैर-आदिवासियों की बढ़ती घुसपैठ, राजनैतिक दलों और धार्मिक संगठनों की मिलीभगत से की जा रही लूट और निरीह हत्याओं की असलियत और साजिश सामने आ रही है.
खैर, इन विषयों पर बहुत सी बातें होती रही है और आगे भी होती रहेगी. कुछ और भी मार्के की बातें है जो गम्भीर है.
बस्तर का दशहरा भारत का एक अनोखा दशहरा है, भगवान श्री राम का इससे कोई लेना देना नहीं है. वैसे भी यह दंण्डकारण्य है और दन्तेवाड़ा के उत्तर-पश्चिम में लंका नामक एक जगह भी है और इस अंचल में रावण मारने की भी कोई परम्परा भी नहीं है. बस्तर दशहरा का सरकारीकरण हुआ सो हुआ लेकिन पिछले कुछ सालों में इस उत्सव में गैर आदिवासियों का दखल और दबदबा बढ़ गया है. बस्तर दशहरा के कमेटी में गैर-आदिवासी, बाहरी, व्यापारी, उच्च वर्गों का कब्जा हो रहा है. इनके बीच आदिवासी घुटन महसूस कर रहे है. जय माता दी और जय श्री राम आदि के नारे आदिवासियों को चुभ रहे है. लाऊड स्पीकरों और सरकारी बैंड के शोर में इनका पारंपरिक वादन दब गया है. जिस दिन का इंतजार यहाँ के आदिवासियों को साल भर से रहता है, जिसके लिये वे दिन-रात तैयारी में लगे रहते है, कुछ ही घंटे में निराश, हताश और अपमानित महसूस करते है. इनके पूजा-पाठ के तौर-तरीकों, नाच-गान और देवताओं के साथ झूपने का मजाक उड़ाया जाता है.
दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मन्दिर में कुछ सालों से जसगीत शुरू हुआ. जगदलपुर के दंतेश्वरी मन्दिर में सांई बाबा का चित्र टंगी देख आश्चर्य होता है. मन्दिर के पुजारी बतलाते है कि एक प्रभावशाली स्थानीय कांग्रेसी नेता ने किस चतुराई के साथ सांई बाबा को मन्दिर में एंट्री दिलवाई. जगदलपुर में एक 50-60 फीट की हनुमान की मूर्ति स्थापित की गई है. पिछले कुछ सालों में बजरंग दल, शिव सेना और अन्य हिन्दू धर्म के संघठनों ने बड़ी तेजी से पैर फैलाया है. हजारों साल पहले हुये “द्रविणों पर आर्यो का हमला” आज भी अपने तरिके से जारी है.
बस्तर के दशहरे पर्व में आदिवासी समाजों की अपनी-अपनी विशिष्ट स्थान और जिम्मेदारियाँ है लेकिन गैर आदिवासी, धार्मिक और राजनैतिक दल के पदाधिकारी, व्यापारी और उच्च वर्ग मिलकर इन पर अपना कब्जा कर रखा है. आने वाले कल में दंतेश्वरी माई की छतरी उठाने वाला कोई अन्य राज्य का, कोई सिन्धी, कोई बनिया या यही लोग रथ खींचने भी लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. जब तक उद्योग नहीं लगे हैं तब तक जितना बचा है बचा है, जैसे ही लगेगा सब खत्म.
ये शहरी सभ्य समाज के लोग बड़े गर्व से यह कहते है कि हमने इन आदिवासियों को जीने का तरीका सिखाया है, कपड़े पहनना सिखाया है नहीं तो ये जंगलों में नंगे रहते थे. इन असभ्य लोगों को हमने सभ्य बनाया है. इन सभ्य समाज के ठेकेदारों को यह नही भूलना चाहिये कि इनका धन्धा इन्हीं से चलता है. नेताओं को समझना चाहिये कि वे इन्हीं जनता के द्वारा ही चुने जाते है.
नक्सलियों को बस्तर में पैर जमाये 30 साल हो गये लेकिन इसके बाद भी बस्तर में एक भी ऎसा नेता या आग पैदा नहीं हुआ जो दमन, शोषण और अपमानजनक विचारों का खात्मा करें या इतना डर पैदा करे या इन आदिवासियों में इतना आत्मविश्वास पैदा करें कि ऎसी सोच को कुचला जा सकें. दुर्भाग्य है!
बस्तर में जितने भी प्रकार के आदिवासी हस्तकलाएँ थी, खत्म हो गई. मुझे याद है कुछ साल पहले तक ही बहुत से परिवार थे जो टेराकोटा, बेलमेटल, रॉट आयरन और लकड़ी के खुबसूरत कलाकृतियाँ बनाते थे लेकिन देखते-ही-देखते आज कलाकार या तो यह काम छोड़ दिये है या तो बड़े व्यापारी के यहाँ काम करने को मजबूर हैं, क्योंकि इनके बाजार को पूरी तरह से इन्हीं लोगों ने कब्जा कर रखा है. करोड़ो-अरबों खर्च करने के बाद भी राज्य सरकार इन्हें बचा नहीं पाई.
विकास के नाम पर आदिवासियों की भावनाओं को यहाँ तक कुचला गया कि इनके मृतक स्तम्भों को तोड़-तोड़ कर चमकदार सड़कें बना दी गई. मुझे याद है कि झारखण्ड में कोयलकारो परियोजना को वहाँ के आदिवासियों ने केवल इसलिये नही बनने दिया कि वे अपने गाँव के देवताओं को जलमग्न नहीं होने देना चाहते थे. क्योंकि यही उनकी एक पहचान है. लेकिन छत्तीसगढ में इतना कुछ होने के बाद भी ऎसी स्थिति नही बन पाती है कि कोई बड़ा आन्दोलन खड़ा हो और न ही ऎसे नेतृत्व है जो जनता के लिए लड़े और न ही कोई ऎसा जन संगठन है जो गदर मचा सके.
लेकिन बस्तर सिर्फ समस्या ही नहीं है, और भी बहुत सी अच्छी बातें भी है जिसको जानना और समझना अभी भी बाकी है. देवी-देवताओं और मान्यताओं में यहाँ के आदिवासी अभी भी पूरी तरह से विश्वास रखते है. जंगल, जीवन और लोक कथाओं की बड़ी समझ, अभी भी बाकी है. मेरे जैसे फिल्मकार के लिये बस्तर का दशहरा एक बहुत बड़े अवसर की तरह है क्योंकि यही वह समय होता है जब पूरे बस्तर से विभिन्न क्षेत्र से आदिवासी आते है और बहुत से लोगों से मिलने, बातचीत करने, जानने और समझने का मौका मिलता है. यही के राजमहल के अहाते में मुझे बड़ॆ-डोंगर के पास के गाँव से आये एक बुज़ुर्ग से मुलाकात हुई जो अपनी जवानी में घोटुल जाते थे और उन्होने मुझे दिनभर थके होने के बावजूद रात में लगातार चार घंटे ऎसे-ऎसे गीत सुनाये जो अब गाएँ नहीं जाते.
“विश्व इतिहास की झलक” पढ़कर पता चलता है कि समाज और सभ्यता किस तरह से बनती और बिगड़ती है. जब हम वर्तमान में घटनाओं को होते देखते है तब दिल-दिमाग आन्दोलित होना स्वाभाविक है.
तेजेन्द्र
Tuesday, September 30, 2008
शंकर की जीत
हालांकि छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा आज तीन हिस्सों में और बहुत से उप हिस्सों में अलग-अलग लोगों द्वारा संचालित है लेकिन फिर भी दूर-दूर से जो लोग आते हैं वे नि:सन्देह वर्तमान नेता या मुखिया के कारण नहीं बल्कि कामरेड शंकर गुहा नियोगी के कारण ही आते हैं.
अभी तक हम रैली या भीड़ के नाम पर राजनैतिक और धार्मिक भीड़ ही देखते आये हैं लेकिन दल्ली-राजहरा की यह भीड़ ऎसी नही है. 17 साल बाद भी हजारों लोग एक ऎसे व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने आते है जो उनके लिये तो अब कोई करिश्मा नही कर सकता लेकिन आस आज भी बरकरार है. हर साल की तरह आज भी शहादत दिवस पर दूर-दूर से मजदूर और किसान आये हैं अपने पुराने कामरेड नियोगी को श्रद्धांजलि देने.
लेकिन यह साल पिछले साल की तरह नहीं रहा और परिस्थितियां बदली हुई लगी. दल्ली-राजहरा में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा कहीं न कहीं उद्देश्य से छूटे और मुद्दाहीन नजर आये. पिछले साल की अपेक्षा भीड़ इस बार लगभग आधी रही. किसी ठोस एजेंडा और करिश्माई व्यक्तित्व वाले नवयुवक नेता की कमी महसूस की जा रही है.
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और पूर्व विधायक श्री जनक लाल ठाकुर जी इसके पीछे अन्य राजनैतिक दल और नवयुवकों को मानते है. उनका मानना है कि नौजवान संगठित नही है, वे भटक गये हैं और उपभोक्तावादी हो गये है वगैरा वगैरा. लेकिन ताज्जुब होता है कि शंकर गुहा नियोगी के पुत्र जीत गुहा नियोगी एक नई जन संगठन (जन मुक्ति मोर्चा) बना कर इन्हीं नौजवानों को संगठित कर रहे है और आगे बढ़ रहे है.
जन संगठन और राजनीति की बातों को भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में जब मैं मोटे तौर पर देखता/सोचता हूं तो लगता है कि ब्रिटिशकाल और आपातकाल, एक अन्धकार युग था. एक लम्बे समय के लिये और एक बहुत कम समय के लिये. लेकिन भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण घटना. इसी को थोड़ा एक दूसरे से जोड़ कर सोचता हूं तो ऎसा लगता कि फिर से एक बड़े परिवर्तन का एक दौर आयेगा.
वर्तमान में छत्तीसगढ़ में नवयुवकों का यदि कोई संगठन है तो वह है जन मुक्ति मोर्चा और यह लोकतांत्रिक तरीके से चल रहा है. जीत गुहा नियोगी के साथ ऎसे नौजवान हैं जिन्होंने कभी शंकर गुहा नियोगी को देखा-सुना नही है. बहुत से आज के नौजवान आपातकाल के (1975-1977) समय या उसके आसपास पैदा हुये (सत्तर के अंत में).
आपातकाल ने उस समय के नौजवानों की पत्रकारिता और राजनीतिक सोच ही बदल कर रख दी. लेकिन आपातकाल के समय या बाद में पैदा हुए लोगों ने इन तीस सालों में इस तरह का ऎसा कोई बड़ा घटनाक्रम वाला राजनैतिक दौर नही देखा है. आजादी की कहानी की तरह हम केवल सुनते रहे. बाद का जो परिवर्तन था, वह था नरसिम्हा राव का उदारीकरण और फिर भाजपा का हिन्दुत्ववाद. आज नौजवानों को इसी ने सबसे ज्यादा जकड़कर रखा है. तीस सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बहुत सी घटनायें हुई लेकिन परिवर्तन लाने की हद तक कोई बहुत बड़ा आन्दोलन नही हुआ. सभी जनसंगठनें अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करती रहीं. आज का नौजवान कहीं न कहीं आपातकाल के दौर के अपने-अपने क्षेत्र के एंग्री यंगमैन की तरफ मुंह फाड़े देखते नजर आते है.
बहुत से जन संगठन अब धीरे-धीरे एन.जी.ओ. हो गये है और उसी को जन संगठन साबित करने में लगे हुये है. एन. जी. ओ. के नौजवानों को बिल्कुल दूसरी तरह का प्रशिक्षण मिल रहा है. छत्तीसगढ़ के बहुत से जनसंगठन रायपुर, भोपाल और दिल्ली में बैठक कर गहन विषयों (ग्रामीण और आदिवासी विषयों पर) पर गहन चर्चा करते रहते है!!!!!!
छत्तीसगढ़ में वर्तमान में राजनीति की कोई नर्सरी दिखती नही है. किसी भी प्रकार की छात्र राजनीति यहाँ नही हो रही है. लेकिन दल्ली-राजहरा क्षेत्र में जो नौजवानों की भीड़ (जन मुक्ति मोर्चा) मैंने देखी, वह किसी राजनैतिक दल की रैली या नवरात्रि या बोलबम की भीड़ नही थी बल्कि नौजवानों की अनुशासित संकल्प रैली थी. उनमें बेरोजगार थे, किसान थे और मजदूर थे. किसी जन संगठन की शैशवास्था को देखना हो तो फिर से दल्ली-राजहरा जाना चाहिये.
इस युवा जनसंगठन को देखकर अन्य राजनैतिक पार्टियों की ओर भी ध्यान जाता है, छत्तीसगढ़ में खासकर भाजपा और कांग्रेस की ओर. लेकिन इन पार्टियों के क्षेत्रीय या राष्ट्रीय सुप्रीमो द्वारा जाति और वर्ग के आधार पर युवा शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है. इन पार्टियों के अधिकतर युवा अपने वरिष्ठ आकाओं की चापलूसी करती ही नजर आती है. इनके युवा संगठनों की अपनी कोई स्पष्ट युवा नीति नहीं दिखती.
दूसरी तरफ जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जैसा जन संगठन, ऎसा लगता है धीरे-धीरे बिखर और सिमट रहा है वैसे ही वैसे जन मुक्ति मोर्चा धीरे-धीरे नवयुवकों के नस-नस में ताजे खून की तरह दौड़ और फैल रहा है. कामरेड शंकर गुहा नियोगी के शहादत के 17 साल बाद आज एक नया नेतृत्व पूरी शक्ति के साथ सामने आ रहा है. प्रश्न यह उठता है कि क्यों आज नौजवान उनके साथ है और एकजुट हो रहे है. आज जब कांगेस, भाजपा और उनकी ढेर सारी योजनायें पंचायत और नगरीय नौजवानों को (जातिगत भी) लुभा रही हो तो क्यों फिर लोग जन मुक्ति मोर्चा की अगुवाई में एकजुट हो रहे हैं.
जन मुक्ति मोर्चा की रैली की शूटिंग करने जब मैं रात को एक गांव “अछोली” पहुंचा, जहां जीत गुहा नियोगी अपने सैकड़ों साथियों के साथ पहुंचने वाले थे, माहौल गर्मजोशी का था. अछोली और आसपास के गांव के 40-50 युवक जमा हो चुके थे. स्वागत और खाने-पीने की व्यवस्था की तैयारियाँ चल रही थी.
रैली के नजदीक पहुंचने की खबर सुनते ही सभी सक्रिय हो गये. दूर से ही “इंकलाब जिंदाबाद” और “कामरेड शंकर गुहा नियोगी अमर रहे” जैसे नारों की गूंज सुनाई दे रही थी. जैसे-जैसे अन्धेरे को चीरते रैली पास आने लगी जोश बढ़ता गया. बहुत से साथी खराब सड़क और बिजली नहीं होने के कारण चोटिल हुये. लेकिन जोश में कही कोई कमी नहीं थी. यहाँ के नवयुवक जिस तरह से जीत की अगुवाई करने को तैयार हैं उसे देखना ही अपने आप में रोमांचक था.
थोड़ी देर बाद सड़क पर ही दरी बिछा कर लोग कतार में बैठे खाना खाये. सभी काम नौजवान ही कर रहे थे, बिना किसी संरक्षक के, स्वस्फूर्त. क्या वे भटके है? क्या वे अनुशासनहीन है? सभी लोग आदिवासी भवन और स्कूल के प्रांगण में सोये. सुबह फिर से रैली शुरू हुई.
जीत गुहा नियोगी को उम्मीद थी कि इस रैली में वर्तमान से तीन गुना लोग शामिल होते, चूंकि यह साईकिल रैली थी, महिलायें और बुज़ुर्ग शामिल नहीं हो सके. दल्ली-राजहरा के पहुंचते तक यह संकल्प साईकिल रैली नुमा नदी, विशाल जन सभा रूपी समुद्र में मिल जाने वाली है.
तेजेन्द्र ताम्रकार
30 सितम्बर 2008
Thursday, May 29, 2008
तेन्दुपत्ता या रतनजोत
क्या इस बात की कल्पना भी की जा सकती है कि रतनजोत कितना नुकसान दायक हो सकता है. इसका जवाब हाँ मे भी हो सकता है और नही में भी. पिछले दो-तीन महीनों में जितनी भी बार मेरी मुलाकात रतनजोत से हुई है, अच्छी नही रही. यह सुन्दर सा विदेशी पौधा कैक्टस ही नजर आया. रतनजोत से तो अच्छा नाम बगरंड़ा है, कुछ डरावना, भस्मासुर जैसा.
मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह जी आयुर्वेद के जानकार है और एक डॉक्टर भला ऎसी गलती कैसे कर सकता है यह भी समझ में नही आया! मवेशी तक तो रतनजोत खाते नही. क्या उन्होने रतनजोत से ऎसी कोई दवाई खोज निकाली है जो उन हजारों देशी वनस्पति से भी कारगर है? वर्तमान में तो यह एक पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में चल रहा है. उत्पादन शुरू भी नही हुआ है और अभी से इससे होने नुकसान नजर आने लगे है.
दो महिने पहले एक डॉक्युमेंटरी फिल्म के लिये मैने बिलासपुर में कुछ बच्चों और उनके अभिभावकों की इंटरव्युह की. लगभग 3 से 12 वर्ष तक के एक दर्जन बच्चे रतनजोत खाकर बीमार पड़े थे और उन्हे तुरंत सिम्स में भर्ती कराया गया था. जहाँ मैने शुटिंग की थी वह बिलासपुर का इमलीभाटा क्षेत्र है और यह कोई पहली घटना नही थी. चुंकि कुछ घटनाये शहर या शहर के आसपास के इलाकों में होती है, दुर्घटना का पता चल जाता है. फिर पिछले महिने सी. पी. एम. के श्री संजय पराते के साथ कांकेर के परलकोट क्षेत्र में जाने का मौका मिला. चुंकि पूरी यात्रा बाईक से थी तो जगह-जगह रूक-रूक कर बहुत सी बांतों को समझने और जानने का मौका मिला. इसमें से एक थी सड़क के दोनो तरफ फैली हुई बगरंडा.
यह पहली बार नही था इस तरह से किलो मीटर नापना लेकिन अप्रेल-मई तेन्दुपत्ता का मौसम तो होता ही है और अगर शहर से 100-150 कि.मी. दूर जाये तो सड़क के दोनो तरफ अपने से उगे तेन्दुपत्ता जरूर दिखाई दे जाते है लेकिन इस बार अंतर था. तेन्दुपत्ता की जगह फैला था भस्मासुर-बगरंडा.
पंचायत, वन विभाग और रोजगार गारंटी के तहत लाखों रूपये खर्च कर इस पूरे क्षेत्र में पिछले दो साल से रतनजोत के पौधे का रोपण किया जा रहा है.
पहले बात करे भ्रष्टाचार की- एक तो रतनजोत का रोपण, रोजगार गारंटी के तहत किया जा रहा है जो वनीकरण के शर्तो में नही आता. ऊपर से रोपण करने वाले ग्रामीणों को दो-तीन महिने से मजदूरी भी नही मिली है.
ग्राम पी.व्ही. 20 ग्राम पंचायत-बैकुंठपुर, ब्लॉक कोयलीबेडा, कांकेर में कुछ लोगो ने अपने रोजगार गारंटी कार्ड दिखाये, जिन्होने वनीकरण के नाम पर दो महिने पहले रतनजोत का पौधा रोपण किया था लेकिन आज तक इन्हे भुगतान नही हुआ है. इसी गाँव के जतनशील और सुभाष सरकार ने बतलाया कि हम लोग 15,000 रतनजोत लगाये. उसमें 7 लाख का काम रोजगार गारंटी की तहत हुआ फिर एस.डी.एम. ने और 5,000 बढ़ाया उसके बाद फिर 10,000 बढ़ाया फिर उसके बाद पेमेंट दिया. उस समय पेमेंट को लेकर 7 लाख का घोटाला हुआ था. असल पेमेंट तो मात्र 28,000 से 30,000 तक ही हुआ था. और अभी वहाँ एक भी झाड़ नही है. उस समय हम लोग 15-20 आदमी इस काम के तहत गये हुये थे और यह लगभग एक महिने तक चला. सरकारी जमीन पर लगाया गया और वर्तमान में ज्यादा से ज्यादा 50-100 ही पौधे ही जीवित होंगे.
आदिवासी क्षेत्र में फल खाने की संख्या बढ़ेगी- अभी भी छत्तीसगढ़ का बहुत बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र है और यहाँ रहने वाले जनजातियाँ न केवल वनोपज से आर्थिक लाभ लेती है वरन् उनके भोजन का हिस्सा भी है और वे जड़ी-बूटी के बड़े जानकार भी है. अगर इसी तरह से बगरंडा लगाया तो उपरोक्त तीनों बांतों पर देर-सबेर भारी असर पड़ेगा. आदिवासी क्षेत्र में यदि गलती से कोई फल खा ले तो तुरंत किसी को समझ में भी नही आयेगा और पास ही कोई आपात चिकित्सा की सुविधा भी नही होगी. जब तक फल नही लगे है तब तक तो ठीक है लेकिन तब क्या होगा जब यही आदिवासी बच्चे नजदीक में ही मुफ्त में काजू की तरह लगने वाले फल को खायेंगे!!!
पी.व्ही. 26 मायापुर पंचायत के गणॆश बर्मन ने बतलाया कि कुछ साल पहले पी.व्ही. 45 में रतनजोत खाने से दो बच्चे बीमार पड़े थे. उनकी हालत बहुत खराब थी. एक बच्चा तो कई घंटो तक भी होश में नही आया था और दुसरा भी 4-5 घंटे तक बेहोशी की हालत में रहा.
तेन्दुपत्ता व्यव्साय पर जबरदस्त प्रभाव पड़ेगा- पखांजूर से दुर्ग कोन्दल के रस्ते पर पुरे समय हमारी नजर रतनजोत और तेन्दुपत्तो पर ही रही. जो बांते कुछ ग्रामीनों से हुई वह वाकई चौकाने वाली थी कि कही न कही रतनजोत, तेन्दुपत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है और फिर यह ख्याल आता रहा कि यदि इसी तरह से रतनजोत लगाया गया तो अन्य वनस्पतियों के साथ-साथ तेन्दुपत्ता भी चौपट हो जायेगा.
पखांजूर से दुर्गकोन्दल के मुख्य मार्ग के दोनो तरफ रतनजोत का रोपण हुआ है. बीच में ऎसे कुछ जगह है जहाँ तेन्दुपत्ता अपने नैसर्गिक रूप से मौजुद है, घने है और बढ़त भी अच्छी है. लेकिन साथ ही ऎसा बड़ा क्षेत्र भी आया जहाँ दोनो तरफ रतनजोत का रोपण हुआ है. जहाँ-जहाँ रतनजोत है वहाँ तेन्दुपत्ता या तो नही है, या तो कम है और अगर है तो बढ़त नही है. लेकिन ऎसा हमने एक भी बार नही देखा कि रतनजोत और तेन्दुपत्ता की सघनता और ऊंचाई बराबर हो.
सड़क के दोनो तरफ जहाँ सामने की ओर रतनजोत है वहाँ तेन्दुपत्ता नही है और जहाँ सड़क से 100-200 मीटर दूर रतनजोत है वही सामने की तरफ तेन्दुपत्ता है लेकिन वहीं 100-200 मीटर दूर रतनजोत के पास तेन्दुपत्ता नही है. वही ऎसे भी कुछ क्षेत्र भी देखने को मिले जहाँ ढ़लान है और पानी का स्रोत है वहाँ रतनजोत सघन है और ऊंचाई भी है लेकिन इसका तेन्दुपत्ता पर असर पड़ा है.
आदिवासी साल के चार महिने इन्ही तेन्दुपत्ता पर निर्भर रहते है और उन्हे अभी भी तेन्दुपत्ता पास ही के जंगलों में मिल जाता है, दूर जाने की जरूरत नही होती. अब देखना यह है कि अगर वाकई में रतनजोत तेन्दुपत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है तो यह आने वाले आठ-दस सालों में ही यह तेन्दुपत्ता का कितने बड़े भु-भाग पर असर डालेगा. अभी शायद यह बहुत ज्यादा चिंता का विषय नही है क्योंकि तेन्दुपत्ता के बहुत बड़े हिस्से को तोड़ा ही नही जाता. इस तरह से यह निश्चिंतता तो हो सकती है कि कम से कम कुछ दशक तक नुकसान की भरपाई हो जायेगी लेकिन नही भुलना चाहिये कि इससे एक तो पत्ते तोड़ने दूर तक जाना होगा और फल खाने की घटनाये निश्चित तौर पर बढ़ेगी.
जब रतनजोत का रोपण किया जाता है तब जो गढ्ढ़ा खोदा जाता है उससे भी तेन्दुपत्ता को नुकसान होता है.
साल में एक बार बूटा कटाई होती है और फिर तेन्दु का पौधा अपने से बढ़ने लगता है. लेकिन रतनजोत रोपण के नाम पर तीन-तीन, चार-चार बार बूटा कटाई हुई है. जिस कीटनाशक ‘क्लोरोफास’ और अन्य दवा का प्रयोग किया जाता है वह आसपास की वनस्पति को नुकसान पहुंचा रहा है. यह कीटनाशक दवा केयर टेकर के लिये भी नुकसानदेह है. इससे त्वचा और साँस में तकलीफ होती है. लेकिन सरकार ने अभी तक किसी को भी इससे होने वाली बिमारी के बारे में न तो बतलाया है और न ही किसी प्रकार का जागरूकता अभियान चलाया है.
दुर्गकोन्दल के श्री शक्ति डे ने भी बतलाया कि उनके क्षेत्र में रतनजोत के रोपण के बाद से तेन्दुपत्ता की सघनता में कमी आई है और जहाँ-जहाँ पर रतनजोत है वहाँ घास भी नही उगती.
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार जिद्द पर यह प्रोजेक्ट कर रही है और पूरे देश में केवल डॉ. रमन सिंह के अलावा किसी की गाड़ी बायो-डीजल से नही चलती. जहाँ तक बात बायो-डीजल के सस्ते में उपलब्ध होने की है तो डीजल और पेट्रोल पर लगने वाले बहुत से टैक्स हटा दे तो यह कीमत बायो-डीजल से कम ही होगी यानि बायो-डीजल महंगा साबित होगा.
बाद में रतनजोत पर कृषि वैज्ञानिक श्री पंकज अवधिया से बात हुई तो उन्होने बतलाया कि चिंता की बात तो है लेकिन साथ ही तकनीकि दिक्कतें भी है और वैज्ञानिक चुनौतीयां भी.
बगरंडा (रतनजोत) बिल्कुल बेशरम की ही तरह फैल रहा है और महिसासुर जैसे बहुत बड़े क्षेत्र को तबाह कर रहा है. आज नही तो कल आदिवासी क्षेत्रों में इसकी वजह से भुखमरी फैलेगी जैसा कि ‘शक्ति डे’ ने कहा. इसलिये बहुत जरूरी है कि यह तय हो कि क्या तोड़े और हमें क्या चाहिये तेन्दुपता या रतनजोत.